एक लड़की होती है
जिसे बचपन में गुड़िया दी जाती है,
और छोटी सी
थाली-चम्मच।
उसे खेल-खेल
में सिखाया जाता है
कि “खाना बनाना
सीख लो,
कल को अपने घर
काम आएगा।”
वो पूछती नहीं
कि अपना घर कौन-सा है,
क्योंकि उसे
बताया जाता है
जहाँ तुम जाओगी,
वही तुम्हारा
घर होगा।
एक दिन
एक आदमी उसे
मुस्कुराकर कहता है —
“तुम्हारे हाथों
का खाना बहुत अच्छा है।”
बस, वहीं से शुरू होती
है मेरी कहानी
एक रिश्ता
जिसमें प्यार
के साथ-साथ
ज़िम्मेदारियों
की एक लंबी सूची
मेरी हथेली पर रख दी
गई ओर जानते या अनजाने मे
धीरे-धीरे
में रसोई का
इलाका बन गई
चूल्हे की आँच
मेरी उंगलियों में
मिलने लगी
मसालों की
खुशबू में
मुझे अपनी
पहचान लगने लगी
मुझे लगा यह
मेरी उंगलियों पर चल रही
पर जाने न कब में भूल गई यह मेरी मर्जी नहीं
पर क्या यह ओब्सेशन है?
या फिर
एक सीमित
दुनिया में
खुद को ज़िंदा
रखने की कोशिश?
किचन साथी बना
क्योंकि परिवार
ने कोई स्थान न दिया ।
कहते हैं
भारतीय औरतें
भगवानों में
बहुत विश्वास रखती हैं।
पर क्यू उन्होंने
भी तो मुझे मेरा स्थान न दिया
पर मुझे तो आदत थी न दबने की तो
जिसने दबाया,
उसी से प्यार
करना सिखाया गया।
जिसने रोका,
उसी को “पति
परमेश्वर” कहा गया।
मुझे समझाया
गया कि
त्याग ही मेरी ताक़त है,
और सहना ही मेरी पूजा।
में भगवान से शिकायत नहीं करती,
क्योंकि मुझे सिखाया गया है
कि शिकायत पाप
है।
में बस माँगती
है —
अपने बच्चों की
खुशहाली,
अपने पति की
लंबी उम्र,
अपने घर की
शांति।
खुद के लिए
में बहुत कम
माँगती है।
कहते हैं,
औरतें बढ़ना
नहीं चाहतीं।
पर सच यह है —
वो बढ़ना चाहती
हैं,
पर हर बार
उनके पैरों में
“कर्तव्य” की बेड़ियाँ बाँध दी जाती हैं।
उन्हें बताया
जाता है
कि पहले घर,
फिर परिवार,
फिर समाज,
और सबसे अंत
में
अगर समय बचे तो
खुद।
उनके काम को
अक्नॉलेजमेंट
नहीं मिलता,
क्योंकि उसे
“फर्ज़” कह दिया जाता है।
जो रोज़ होता
है,
वो खास नहीं
माना जाता।
जो बिना वेतन
के हो,
वो काम नहीं मना जाता है।
और फिर
जो गुस्सा भीतर
जमा होता है,
वो पीढ़ी दर
पीढ़ी
सौंप दिया जाता
है।
सास से बहू,
माँ से बेटी —
“मैंने सहा था,
तुम भी सीखो।”
औरतें एक-दूसरे को बढ़ते देखना चाहती हैं,
पर काम का बोझ
उन्हें
एक-दूसरे का दुश्मन बना देता है।
जब एक बाहर
निकलती है,
दूसरी सोचती है
—
“मैं क्यों नहीं
निकल पाई?”
और उस सवाल का
जवाब
वो खुद से नहीं,
उससे माँगती है
जो आगे बढ़ी है।
किचन से ओब्सेशन
शायद सच में
ओब्सेशन नहीं,
बल्कि पहचान का
संकट है।
जब पूरी दुनिया
तुम्हें
एक ही कमरे में
परिभाषित करे,
तो तुम उस कमरे
को
अपना ब्रह्मांड
बना लेती हो।
कहानी हमेशा विजेता नहीं लिखते,
कभी-कभी चुप
रहने वाले भी
अपनी कहानी
भीतर लिखते रहते हैं।
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