भारत में श्रम कानूनों की शुरुआत औपनिवेशिक दौर में हुई। सबसे पहले महत्वपूर्ण कानून था Factories Act 1881। इस कानून का मुख्य उद्देश्य कारखानों में काम करने वाले मजदूरों, खासकर बच्चों, के काम के घंटे तय करना और कुछ बुनियादी सुरक्षा देना था।
इसके बाद
समय-समय पर कई कानून बने –
- न्यूनतम वेतन
- काम के घंटे
- ट्रेड यूनियन का अधिकार
- हड़ताल का अधिकार
- सामाजिक सुरक्षा
- महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा
ये सभी अधिकार
मजदूरों को सरकार ने खुद से नहीं दिए थे, बल्कि लंबे संघर्ष और आंदोलनों के बाद मिले।
आज भारत की
लगभग 81% कार्यशील
आबादी असंगठित
क्षेत्र में काम करती है। इसका मतलब है कि देश की बहुत बड़ी आबादी मजदूर वर्ग से
जुड़ी है। इसलिए श्रम कानूनों में कोई भी बदलाव करोड़ों लोगों की ज़िंदगी को
प्रभावित करता है।
29 लेबर लॉ को चार कोड में क्यों बदला गया?
सरकार का कहना
है कि आज़ादी के बाद से बने 29 अलग-अलग श्रम कानून पुराने हो चुके थे। इसलिए उन्हें “सरलीकृत” करके चार नए
कोड में बदल दिया गया।
ये चार कोड
हैं:
- Code on
Wages 2019
- Industrial
Relations Code 2020
- Code on
Social Security 2020
- Occupational
Safety, Health, and Working Conditions Code 2020
सरकार का तर्क
है कि ये कोड "Ease of Doing Business" बढ़ाएंगे, निवेश आकर्षित करेंगे और श्रम कानूनों को आधुनिक बनाएंगे।
चारों कोड की
मुख्य बातें
(A) Code on Wages 2019
इस कोड में
चार पुराने कानूनों को मिलाया गया:
- Minimum
Wages Act
- Payment of
Wages Act
- Payment of
Bonus Act
- Equal
Remuneration Act
मुख्य
प्रावधान:
- पूरे देश में न्यूनतम वेतन की
अवधारणा लागू।
- “Floor Wage”
तय करने का अधिकार
केंद्र सरकार को।
- पुरुष और महिला को समान वेतन।
- वेतन की परिभाषा एक समान बनाई
गई।
सकारात्मक
पहलू:
वेतन की एक
समान परिभाषा
लैंगिक समानता पर जोर
आलोचना:
Floor wage कितना होगा, यह स्पष्ट नहीं
न्यूनतम वेतन का वास्तविक क्रियान्वयन अभी भी राज्यों पर निर्भर
(B) Industrial Relations Code 2020 (सबसे विवादित)
इस कोड में
शामिल थे:
- Trade Unions
Act
- Industrial
Disputes Act
- Industrial
Employment Standing Orders Act
मुख्य बदलाव:
1. वर्कर की परिभाषा
वर्कर की
परिभाषा में सुपरवाइजरी कर्मचारियों की आय सीमा तय की गई। इससे कई लोग “वर्कर” की
श्रेणी से बाहर हो सकते हैं।
2. यूनियन मान्यता
अगर किसी
यूनियन को मान्यता चाहिए तो 51% कर्मचारियों का समर्थन जरूरी है।
आलोचना यह है
कि इससे यूनियन बनाना कठिन हो सकता है।
3. छंटनी और कंपनी का आकार
पहले 100 कर्मचारियों वाली कंपनी को छंटनी
से पहले सरकार की अनुमति लेनी पड़ती थी।
अब यह सीमा 300 कर दी गई है।
इसका मतलब:
- 300 से कम कर्मचारियों वाली कंपनी
बिना सरकारी अनुमति के छंटनी कर सकती है।
- इससे स्थायी रोजगार कम और contract रोजगार बढ़ सकता है
4. हड़ताल पर नियंत्रण
अब हड़ताल से
पहले 14
दिन की नोटिस जरूरी है।
वर्कर सुरक्षा कमजोर
(C) Code on Social Security 2020
इसमें शामिल
हैं:
- EPF
- ESI
- Maternity
Benefit
- Gratuity
मुख्य बातें:
- गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स
(जैसे ऐप आधारित डिलीवरी कर्मचारी) को पहली बार मान्यता।
- सामाजिक सुरक्षा फंड की
व्यवस्था।
(D) Occupational Safety, Health and Working Conditions
Code 2020
इसमें 13 कानून शामिल किए गए।
मुख्य
प्रावधान:
- काम के घंटे तय (आमतौर पर 8 घंटे)
- ओवरटाइम का भुगतान
- महिलाओं को रात की शिफ्ट में
काम की अनुमति (सुरक्षा शर्तों के साथ)
- प्रवासी मजदूरों के लिए
पंजीकरण
विवाद:
- काम के घंटे 12 घंटे तक बढ़ाने की संभावना
(राज्यों के नियमों के आधार पर)
- ज़मीनी हकीकत में पहले ही 9–10 घंटे काम आम है
- निरीक्षण प्रणाली को डिजिटल
कर दिया गया, जिससे फिजिकल जांच कम हो सकती है
यूनियनों की मांगें क्या हैं?
- 300 की सीमा वापस 100 की जाए
- हड़ताल के अधिकार को सीमित न
किया जाए
- न्यूनतम वेतन जीवन-निर्वाह
योग्य हो
- गिग वर्कर्स के लिए ठोस
सामाजिक सुरक्षा
- वर्कर की परिभाषा स्पष्ट हो
असली सवाल
क्या है?
भारत में 80% से अधिक लोग मजदूर वर्ग से जुड़े
हैं — खासकर असंगठित क्षेत्र में। अगर कानून उद्योगों को ज्यादा
शक्ति देता है और मजदूरों की सुरक्षा कमजोर करता है, तो इसका असर समाज के बड़े हिस्से पर पड़ेगा। सरकार का कहना है कि ये कानून
विकास और निवेश के लिए जरूरी हैं।
पर असल में ये कानून मजदूरों के
अधिकारों को कमजोर कर रहा हैं।
पनिश्मन्ट वर्कर्स
के लिए ओर कंपनी को अधिकर दिए गए है।
source-
https://static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2025/nov/doc20251121701501.pdf
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