एक लड़की होती है जिसे बचपन में गुड़िया दी जाती है , और छोटी सी थाली-चम्मच। उसे खेल-खेल में सिखाया जाता है कि “खाना बनाना सीख लो , कल को अपने घर काम आएगा।” वो पूछती नहीं कि अपना घर कौन-सा है , क्योंकि उसे बताया जाता है जहाँ तुम जाओगी , वही तुम्हारा घर होगा। एक दिन एक आदमी उसे मुस्कुराकर कहता है — “ तुम्हारे हाथों का खाना बहुत अच्छा है।” बस , वहीं से शुरू होती है मेरी कहानी एक रिश्ता जिसमें प्यार के साथ-साथ ज़िम्मेदारियों की एक लंबी सूची मेरी हथेली पर रख दी गई ओर जानते या अनजाने मे धीरे-धीरे में रसोई का इलाका बन गई चूल्हे की आँच मेरी उंगलियों में मिलने लगी मसालों की खुशबू में मुझे अपनी पहचान लगने लगी मुझे लगा यह मेरी उंगलियों पर चल रही पर जाने न कब में भूल गई यह मेरी मर्जी नहीं पर क्या यह ओब्सेशन है ? या फिर एक सीमित दुनिया में खुद को ज़िंदा रखने की कोशिश ? किचन साथी बना क्योंकि परिवार ने कोई स्थान न दिया । कहते हैं भारतीय औरतें भगवानों में बहुत विश्वास रखती हैं। पर क्यू उन्होंने भी तो मुझे मेरा स्थान न दिया पर मुझे तो आद...
भारत में श्रम कानूनों की शुरुआत औपनिवेशिक दौर में हुई। सबसे पहले महत्वपूर्ण कानून था Factories Act 1881 । इस कानून का मुख्य उद्देश्य कारखानों में काम करने वाले मजदूरों , खासकर बच्चों , के काम के घंटे तय करना और कुछ बुनियादी सुरक्षा देना था। इसके बाद समय-समय पर कई कानून बने – न्यूनतम वेतन काम के घंटे ट्रेड यूनियन का अधिकार हड़ताल का अधिकार सामाजिक सुरक्षा महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा ये सभी अधिकार मजदूरों को सरकार ने खुद से नहीं दिए थे , बल्कि लंबे संघर्ष और आंदोलनों के बाद मिले। आज भारत की लगभग 81% कार्यशील आबादी असंगठित क्षेत्र में काम करती है। इसका मतलब है कि देश की बहुत बड़ी आबादी मजदूर वर्ग से जुड़ी है। इसलिए श्रम कानूनों में कोई भी बदलाव करोड़ों लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित करता है। 29 लेबर लॉ को चार कोड में क्यों बदला गया ? सरकार का कहना है कि आज़ादी के बाद से बने 29 अलग-अलग श्रम कानून पुराने हो चुके थे। इसलिए उन्हें “सरलीकृत” करके चार नए कोड में बदल दिया गया। ये चार कोड हैं: Code on Wages 2019 Industrial Relations Code...